अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

  1. क्या सीबीआई राज्य पुलिस द्वारा पंजीकृत आपराधिक मामलों का अन्वेषण अपने हाथों में ले सकती है ?
  2. कृपया सीबीआई की संक्षिप्त पृष्ठभूमि से अवगत कराएं ?
  3. सीबीआई पर पर्यवेक्षण कौन करता है ?
  4. सीबीआई से किस प्रकार जुड़ा जा सकता है ?
  5. क्या सीबीआई कर्मियों को किसी भी प्रकार का प्रोत्साहन भत्ता देय है ?
  6. सीबीआई आज किन-किन प्रकार के अपराधों का अन्वेषण करती है ?
  7. राष्ट्रीय अन्वेषण एजेंसी (एनआईए) एवं सीबीआई के द्वारा जांच किए जाने वाले मामलों के स्वभाव में क्या विभिन्ताएं हैं ?
  8. क्या सीबीआई स्वत: ही देश में कहीं भी घटित किसी भी प्रकार के अपराध का जांच कार्य ले सकती है ?
  9. अपराध के पंजीकरण हेतु सीबीआई के समक्ष सम्पर्क करने हेतु क्या आप कोई सामान्य निर्देश पोस्ट कर सकते हैं ?
  10. राज्य में कार्यरत केंद्र सरकार के नियंत्रण में आने वाले लोक सेवकों के विरुद्ध भ्रष्टाचार की शिकायतों के लिए राज्य स्थित सीबीआई के स्थानीय शाखाओं से किस प्रकार सम्पर्क किया जा सकता है, जबकि राज्य के क्षेत्राधिकार में घटित अपराधों को पंजीकृत करने के लिए राज्यों की पूर्व अनुमति प्राप्त करना आवश्यक होता है ?
  11. उपरोक्त प्रश्न संख्या 5 के उत्तर में दर्शाए गए अपराध के संबंध में सूचना/शिकायत प्रदान करने हेतु क्या किसी व्यक्ति की सीबीआई के किसी शाखा में शारीरिक उपस्थिति आवश्यक है ?
  12. सीबीआई के समक्ष सूचना प्रदान करने/शिकायत दर्ज करने के विभिन्न साधन क्या हैं ?
  13. सीबीआई को सूचना/शिकायत प्रदान करने के लिए क्या किसी को अपनी पहचान देना आवश्यक है ?
  14. भ्रष्टाचार एवं गंभीर अपराध के विरुद्ध मौखिक सूचना एवं सूचनादाता को सीबीआई कैसे संभालती है ?
  15. “ट्रैप” क्या है ? हम हमेशा अखबारों में पढ़ते हैं कि सीबीआई ने एक लोक सेवक को ट्रैप में पकड़ा है ?
  16. ट्रैप बिछाने के लिए पैसे कौन मुहैया कराता है ?
  17. ट्रैप बिछाने हेतु शिकायतकर्त्ता द्वारा मुहैया कराए गए पैसों का क्या होता है ?
  18. अगर शिकायतकर्त्ता इतना गरीब हो कि वह स्वयं रिश्वत के पैसों का प्रबंध नहीं कर सकता है, तो क्या इसका मतलब यह तो नहीं कि रिश्वत मांगने वाले भ्रष्ट लोक सेवक के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं हो सकती ?
  19. हम अक्सर यह सुनते हैं कि रिश्वत लेना ही नहीं बल्कि रिश्वत देना भी कानूनन अपराध है। इस मामले में ट्रैप बिछाने हेतु शिकायतकर्त्ता जो आरोपी व्यक्ति को रिश्वत देता है, क्या वह भी एक अपराधी नहीं है ?
  20. एक ईमानदार लोक सेवक को क्या करना चाहिए जब कोई व्यक्ति उसे रिश्वत देने का प्रस्ताव करता है ?
  21. यह अक्सर सुना जाता है कि उच्च पदों पर आसीन लोक सेवक सीधे तौर पर रिश्वत की न तो मांग करते हैं और न ही लेते हैं बल्कि वे किसी दलाल या बिचौलिए के माध्यम से लेते हैं। क्या सीबीआई ऐसे दलालों और बिचौलियों के विरुद्ध भी कार्रवाई करती है ?
  22. क्या ऐसे भी मामले हैं जब सीबीआई ने रिश्वत देने के इच्छुक व्यक्ति और रिश्वत लेने वाले के विरुद्ध एक साथ कार्यवाही की है ?
  23. हम अक्सर अपने बीच भ्रष्ट लोक सेवकों को एक विलासितापूर्ण जीवनशैली जीते हुए और आय से अधिक संपत्ति रखते हुए देखते हैं। क्या सीबीआई ऐसे लोक सेवकों के विरुद्ध कार्यवाही कर सकती है ?
  24. क्या सीबीआई सूचनादाता की पहचान गुप्त रखती है ?
  25. क्या सीबीआई सूचनादाता को नकद पुरस्कार देती है ?
  26. क्या सीबीआई में आंतरिक सतर्कता स्थापित है ?
  27. सीबीआई द्वारा अभियोजित आपराधिक मामलों में दोषसिद्धि दर क्या है ?
  28. मामलों के अन्वेषण में सीबीआई इतना समय क्यों लेती है ?
  29. क्या सीबीआई अपराध अन्वेषण के अलावा भी कोई अन्य महत्वपूर्ण कार्य करती है ?
  30. भारत की इंटरपोल के रूप में सीबीआई की क्या भूमिका है ?
  31. रेड नोटिस क्या है ?
  32. किसी भगौड़े के प्रत्यार्पण में सीबीआई इंटरपोल की क्या भूमिका होती है ?
1. क्या सीबीआई राज्य पुलिस द्वारा पंजीकृत आपराधिक मामलों का अन्वेषण अपने हाथों ले सकती है ?

हां, निम्नलिखित स्थितियों में
(1) संबंधित राज्य सरकार इस संबंध में निवेदन करे एवं केंद्र सरकार राजी हो जाए (केंद्र सरकार राज्य की निवेदन पर निर्णय करने से पहले सामान्यत: सीबीआई की टिप्पणी मांगती है)
(2) डीएसपीई एक्ट की अधिनियम 6 के अंतर्गत राज्य सरकार अधिसूचना जारी कर अपनी सहमति प्रदान करती है एवं केंद्र सरकार डीएसपीई एक्ट की अधिनियम 5 के अंतर्गत अधिसूचना जारी करती है।
(3) उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालयों द्वारा सीबीआई को वैसे अन्वेषण करने का निर्देश दिया जाए।


2. कृपया सीबीआई के संक्षिप्त पृष्ठभूमि से अवगत कराएं ?

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश भारत के युद्ध विभाग में युद्ध सम्बंधित खरीदों में रिश्वतखोरी एवं भ्रष्टाचार की शिकायतों की जांच करने के लिए 1941 में एक विशेष पुलिस स्थापना (एसपीई) का गठन किया गया। बाद में भारत सरकार की विभिन्न स्कंधों में भ्रष्टाचार की शिकायतों का अन्वेषण करने के लिए इसे भारत सरकार की एक एजेंसी के रूप में दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना (डीएसपीई) अधिनियम, 1946 के द्वारा अधिनियमित करने की औपचारिकता की गई। 1963 में भारत सरकार द्वारा अखिल-भारत एवं अंतरराज्य में विभाजित भारत की सुरक्षा, उच्च स्थानों पर भ्रष्टाचार, गम्भीर छल, धोखाधड़ी एवं हेराफेरी एवं सामाजिक अपराधों विशेषकर आवश्यक जिंसों की जमाखोरी एवं मुनाफाखोरी जैसे गम्भीर अपराधों का अन्वेषण करने की दृष्टि से केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) का गठन किया गया। सीबीआई को अपराध का अन्वेषण करने हेतु कानूनी शक्तियां डीएसपीई एक्ट, 1946 से प्राप्त हैं।


3. सीबीआई पर पर्यवेक्षण कौन करता है ? भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम, 1988 के तहत किए गए अपराधों के अन्वेषण से संबंधित सीबीआई की पर्यवेक्षण केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) में निहित है एवं अन्य मामलों में भारत सरकार के कार्मिक, पेंशन एवं शिकायत मंत्रालय के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) में निहित है।


4. सीबीआई से किस प्रकार जुड़ा जा सकता है ?

सीबीआई उप-निरीक्षकों की नियुक्ति कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी) के माध्यम से करता है जो भर्ती संबंधित नोटिस रोजगार समाचारों एवं अन्य महत्वपूर्ण अखबारों में प्रकाशित करती है। सीबीआई पुलिस निरीक्षकों के पदों एवं इनसे ऊपर के पदों पर भी राज्य एवं संघ शासित प्रदेशों के पुलिस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति पर नियुक्त करता है। सीबीआई में गैर-पुलिस अधिकारियों को भी प्रतिनियुक्ति पर लिया जाता है। सीबीआई की विभिन्न पदों, भर्ती/नियुक्ति प्रक्रिया, रिक्तियों से संबंधित विवरण इत्यादि की विस्तृत जानकारी इस वेबसाइट पर पोस्ट किए गए हैं और इनका कृपया संदर्भ लें। इस संदर्भ में विशेष ध्यानाकर्षण सीबीआई की “प्रशासनिक मैनुअल” की ओर किया जाता है जो “हमारे बारे में” लिंक सहित “सीबीआई के भीतर” में भी उपलब्ध है।


5. क्या सीबीआई कर्मियों को किसी भी प्रकार का भत्ता देय है ?

सीबीआई के आरक्षक से लेकर निदेशक पद के सभी एक्जुक्यूटिव अधिकारियों को विशेष भत्ता देय होता है। पुलिस अधीक्षक तक के पद के अधिकारियों को यह वेतन का 25 प्रतिशत देय है और इसके ऊपर के अधिकारियों को यह 15 प्रतिशत के दर पर देय है।


6. सीबीआई आज किन-किन प्रकार के अपराधो का अन्वेषण करती है ?

समय के साथ सीबीआई एक बहु-अनुशासनीय अन्वेषण एजेंसी के रूप में विकसित हुआ है। अपराध के अन्वेषण के लिए आज इसके पास निम्नलिखित 3 प्रभाग हैं –
(1) भ्रष्टाचार निरोधक प्रभाग – लोक कर्मियों एवं केंद्र सरकार, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, भारत सरकार के स्वामित्व या नियंत्रित निगमों या निकायों के कर्मियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम, 1988 के अंतर्गत मामलों की जांच हेतु
(2) आर्थिक अपराध प्रभाग - वृह्द वित्तीय घोटालों एवं नकली भारतीय मुद्रा, बैंक फ्रॉड एवं साइबर अपराधों सहित गंभीर आर्थिक धोखाधड़ी के अन्वेषण हेतु
(3) विशेष अपराध प्रभाग - राज्य सरकारों के निवेदन पर या उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के निर्देश पर भारतीय दंड संहिता एवं अन्य कानून के अंतर्गत गंभीर, सनसनीखेज एवं संगठित अपराधों के अन्वेषण हेतु।
सीबीआई जिन कानून के तहत अपराध का अन्वेषण करती है वह केंद्र सरकार के द्वारा डीएसपीई एक्ट की अधिनियम 3 के तहत अधिसूचित है।


7. राष्ट्रीय अन्वेषण एजेंसी (एनआईए) एवं सीबीआई के द्वारा जांच किए जाने वाले मामलों के स्वभाव में क्या विभिन्ताएं हैं ?

नवंबर, 2008 में मुंबई में हुई आतंकी हमले के पश्चात आतंकी हमलों की घटनाओं, आतंकवाद को धन उपलब्ध कराने एवं अन्य आतंक संबंधित अपराधों का अन्वेषण के लिए एनआईए का गठन किया गया जबकि सीबीआई आतंकवाद को छोड़ भ्रष्टाचार, आर्थिक अपराधों एवं गंभीर तथा संगठित अपराधों का अन्वेषण करती है।


8. क्या सीबीआई स्वत: ही देश में कहीं भी घटित किसी भी प्रकार के अपराध का जांच कार्य ले सकती है ?

नहीं। डीएसपीई एक्ट के भाग 2 क् अनुसार सीबीआई सिर्फ केंद्र शासित क्षेत्रों में ही भाग 3 द्वारा अधिसूचित अपराधों का अन्वेषण स्वत: कर सकती है। डीएसपीई एक्ट के भाग 6 के अनुसार सीबीआई के द्वारा किसी एक राज्य के क्षेत्राधिकार में अन्वेषण हेतु उक्त राज्य की सहमति अनिवार्य है। केंद्र सरकार किसी राज्य में हुए वैसे अपराध का अन्वेषण करने हेतु सीबीआई को प्राधिकृत कर सकती है परन्तु इसके लिए संबंधित राज्य सरकार की सहमति अनिवार्य होती है। यद्यपि उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के द्वारा बिना राज्य सरकार की सहमति के देश में कहीं भी घटित वैसे अपराधों के अन्वेषण के लिए सीबीआई को निर्देश दे सकती है।


9. अपराध के पंजीकरण हेतु सीबीआई के समक्ष सम्पर्क करने हेतु आप कोई सामान्य निर्देश पोस्ट कर सकते हैं ?

केंद्रीय सरकार के नियंत्रण में लोक सेवकों द्वारा भ्रष्टाचार से संबंधित अपराधों, गंभीर आर्थिक अपराधों एवं धोखाधड़ी तथा अंतरराज्य एवं समस्त भारत में बहुशाखित सनसनीखेज अपराधों के अन्वेषण के लिए सीबीआई एक विशेषीकृत एजेंसी है। सीबीआई सामान्य एवं नेमी स्वभाव के अपराधों का अन्वेषण नहीं करता है क्योंकि वैसे अपराधों का अन्वेषण राज्य एवं संघ राज्य क्षेत्र के पुलिस बल के द्वारा किया जाना अपेक्षित होता है।

जहां तक केंद्रीय सरकार के लोक सेवकों द्वारा भ्रष्टाचार के अपराधों का संबंध है, कोई व्यक्ति देश में कहीं भी अपने नजदीक सीबीआई के किसी भी भ्रष्टाचार निरोधक शाखा से सम्पर्क कर सकता है। सीबीआई की वैसी शाखाएं सभी राज्यों की राजधानी एवं कई अन्य शहरों में हैं।

आर्थिक एवं विशिष्ट अपराधों के पंजीकरण हेतु सीबीआई की शाखाएं चारों महानगरों में अर्थात् दिल्ली, मुंबई, कोलकाता एवं चेन्नई में स्थित हैं। इनमें से किसी भी शाखा पर गंभीर अपराधों सहित गंभीर विशिष्ट अपराधों जैसे दवा एवं मानव तस्करी, जाली नोटों, वन्य जीवों का गैरकानूनी शिकार, दवा एवं भोज्य पदार्थों में मिलावट, समस्त भारत एवं अंतरराज्यीय बहुशाखन के संगठित अपराधों से संबंधित सूचना प्रदान करने के लिए संपर्क किया जा सकता है।
क्षेत्राधिकार सहित सीबीआई का ब्यौरा इस वेबसाइट के लिंक “सीबीआई नेटवर्क” पर उपलब्ध है।

जैसा कि ऊपर वर्णित है, सामान्य और नेमी स्वभाव के अपराधों के पंजीकरण हेतु राज्य एवं केन्द्र संघ राज्य के पुलिस से संपर्क किया जाना चाहिए। इसका मतलब यह नहीं है कि गंभीर अपराधों के पंजीकरण हेतु उनसे संपर्क नहीं करना चाहिए। इसका मतलब सिर्फ यही है कि सामान्य और नेमी स्वभाव के अपराधों के पंजीकरण हेतु सीबीआई से संपर्क नहीं करना चाहिए।


10. राज्य में कार्यरत केन्द्र सरकार के नियंत्रण में आने वाले लोक सेवकों के विरुद्ध भ्रष्टाचार की शिकायतों के लिए राज्य स्थित सीबीआई के स्थानीय शाखाओं से किस प्रकार संपर्क किया जा सकता है, जबकि राज्य के क्षेत्राधिकार में घटित अपराधों को दर्ज करने के लिए राज्यों की पूर्व अनुमति प्राप्त करना आवश्यक होता है ?

ऊपर दिए प्रश्न संख्या 7 के उत्तर को ध्यान में रखते हुए यह एक वैद्य आशंका है। भारत के अधिकतर राज्यों ने केंद्रीय सरकार को राज्यों में कार्यरत केंद्रीय सरकार द्वारा नियंत्रित लोक सेवकों के विरुद्ध भ्रष्टाचार की शिकायतों का अन्वेषण करने की “सामान्य सहमति” दे दी है। इसका मतलब यह है कि सीबीआई को प्रत्येक वैसे मामलों में पूर्व सहमति की आवश्यकता नहीं है और वैसे शिकायतों का अन्वेषण जब भी प्राप्त हो, वह बिना राज्य को सहमति हेतु भेज कर स्वयं ही कर सकती है। अगर सीबीआई राज्य सरकार द्वारा नियंत्रित लोक सेवकों के विरुद्ध शिकायतों का अन्वेषण करना चाहती हो तो उसे वैसी सहमति प्राप्त करने की आवश्यकता होती है।

दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि अधिकतर राज्य सरकारों ने सीबीआई को उनके राज्यों में भारत सरकार एवं बैंकों के नियंत्रण में कार्यरत केंद्रीय सरकार, सार्वजनिक क्षेत्रों के निगमों एवं निकायों के कर्मियों के विरुद्ध अन्वेषण करने हेतु प्राधिकृत किया है।


11. उपरोक्त प्रश्न संख्या 5 के उत्तर में दर्शाए गए अपराध के संबंध में सूचना/शिकायत प्रदान करने हेतु क्या किसी व्यक्ति की सीबीआई के किसी शाखा में शारीरिक उपस्थिति आवश्यक है ?

कदापि नहीं। डाक द्वारा सूचना/शिकायत भेज कर, मोबाईल फोन से एसएमएस के द्वारा/संबंधित शाखा को फोन के द्वारा, इसके अधिकारियों को ई-मेल भेजकर और वेबसाइट पर सूचना/शिकायत पोस्ट कर के भी सीबीआई से संपर्क किया जा सकता है। उपरोक्त से संबंधित सभी आवश्यक ब्यौरे इस वेबसाइट के लिंक “हमसे सम्पर्क करें”, तथा ”भ्रष्टाचार के साथ हमारी लड़ाई से जुड़ें” पर उपलब्ध है।


12. सीबीआई के समक्ष सूचना प्रदान करने/शिकायत दर्ज करने के विभिन्न साधन क्या हैं ?

कृपया प्रश्न संख्या 8 एवं 11 का उत्तर देखें।


13. सीबीआई को सूचना प्रदान करने/शिकायत प्रदान करने के लिए क्या किसी को अपना पहचान देना आवश्यक है ?

हां है। केंद्रीय सतर्कता आयोग, भारत सरकार द्वारा तैयार की गई दिशानिर्देशों के अनुसार सीबीआई गुमनाम/छद्म नाम वाली सूचना/शिकायतों पर कोई विचार नहीं करता है।

यद्यपि सूचनादाता/शिकायतकर्ता सीबीआई से अपनी पहचान गुप्त रखने का निवेदन कर सकते हैं। सीबीआई वैसे व्यक्तियों की पहचान की गोपनीयता सुनिश्चित करने हेतु सभी आवश्यक सावधानी उठाती है।


14. भ्रष्टाचार एवं गम्भीर अपराध के विरुद्ध मौखिक सूचना एवं सूचनादाता को सीबीआई कैसे सम्भालती है ?

सीबीआई द्वारा भ्रष्टाचार एवं गम्भीर अपराधों के एक बहुत बड़े भाग को उजागर करने में भरोसे में लिए गए व्यक्तियों की मौखिक सूचना को ही आधार बनाया जाता है। वैसी सूचना या सूचनादाता को संभालने हेतु सीबीआई की एक बहुत ही सुलझी नीति है जिसका बहुत ही कठोरता के साथ पालन किया जाता है। सूचनादाता को सिर्फ वही अधिकारी संभालता है जिसे वह सूचना प्रदान करता है। जिस अधिकारी को सूचना उपलब्ध कराई गई है, उसके वरीय अधिकारियों द्वारा भी सूचनादाता की पहचान की मांग नहीं की जा सकती है। किसी भी लिखित रिकार्ड में वैसे सूचनादाता की पहचान लिखित में नहीं डाली जा सकती है। इसे न्यायालयों को भी उजागर नहीं किया जाता। न्यायालयों को भी यह शक्ति नहीं है कि वे सीबीआई को सूचनादाता की पहचान प्रकट करने हेतु दबाव दें।
वैसी सूचना पर सीबीआई के द्वारा कोई कार्य की शुरूआत नहीं की जाती है जब तक उनका गोपनीय सत्यापन नहीं किया जाता। सूचना की गोपनीयता को ध्यान में रखते हुए उसका विस्तार से सत्यापन किया जाता है। जब यह पूरी तरह से सुनिश्चित हो जाता है कि प्रत्यक्षत: आपराधिक मामला बन सकता है तो अग्रिम कार्यवाही हेतु एक आपराधिक मामला दर्ज कर लिया जाता है।


15. “ट्रैप” क्या है ? हम हमेशा अखबारों में पढ़ते हैं कि सीबीआई ने एक लोक सेवक को ट्रैप में पकड़ा है ?

सीबीआई रिश्वत मांग कर लेने वाले भ्रष्ट लोक सेवकों को पकड़ने पर बहुत जोर देता है। वैसे भ्रष्ट लोक सेवकों को रिश्वत मांग कर लेते हुए रंगे हाथों पकड़ने की प्रक्रिया को ”ट्रैप” कहा जाता है। यह ेक कानूनी शब्द नहीं है। भ्रष्ट लोक सेवक के विरुद्ध ट्रैप बिछाने हेतु सीबीआई के द्वारा एक निर्धारित प्रक्रिया का सृजन किया गया है। ट्रैप की प्रक्रिया के दौरान एकत्र हुए सबूतों को आरोप पत्र सहित न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है और लोक सेवक का दोष सिद्ध करने में महत्वपूर्ण होता है।


16. ट्रैप बिछाने के लिए पैसे कौन मुहैया कराता है ?

कोई और नहीं बल्कि सिर्फ शिकायतकर्त्ता ही पैसे उपलब्ध करता है।


17. ट्रैप बिछाने हेतु शिकायतकर्त्ता द्वारा मुहैया कराए गए पैसों का क्या होता है ?

वैसा पैसा आरोपी के विरुद्ध सबूत का एक महत्वपूर्ण टुकड़ा होता है जिसे अभियोजन के दौरान न्यायालय में इस्तेमाल किया जाता है। इसे सीबीआई के द्वारा जब्त किया जाता है और आरोप पत्र के साथ न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। अभियोजन की समाप्ति के पश्चात न्यायालय शिकायतकर्ता को पैसे वापस करने का निर्देश देता है। अत: पैसा आखिर में अभियोजन की समाप्ति के पश्चात शिकायतकर्ता को वापस कर दिया जाता है।

यद्यपि न्यायालय में पैसे जमा करने पर शिकायतकर्ता द्वारा मुश्किलों का सामना करने को ध्यान में रखते हुए सीबीआई ने एक प्रक्रिया का सृजन किया है जिसके द्वारा बराबर की रकम आरोप पत्र के दायर होने के बाद शिकायतकर्ता को प्रतिपूर्ति कर दी जाती है। यह प्रमाणिक मामलों में कुछ औपचारिकताओं का पालन करते हुए की जाती है जिसमें न्यायालय से निर्देश प्राप्त करना भी शामिल है। दाग लगे रिश्वत के पैसे को अभियोजन की समाप्ति के पश्चात लोक राजकोष में जमा कर दिया जाता है।


18. अगर शिकायतकर्त्ता इतना गरीब हो कि वह स्वयं रिश्वत के पैसों का प्रबंध नहीं कर सकता है, तो क्या इसका मतलब यह तो नहीं कि रिश्वत मांगने वाले भ्रष्ट लोक सेवक के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं हो सकती ?

कदापि नहीं। वैसे मौकों पर भी कार्यवाही की जा सकती है। भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम, 1988 की धारा 7 के अंतर्गत रिश्वत मांगना ही एक दंडनीय अपराध है। यह कहा जा सकता है कि रिश्वत स्वीकार करना एक लोक सेवक को अभियोजित करने हेतु अनिवार्य आवश्यकता नहीं है। एकत्रित सबूतों के द्वारा न्यायालय में यदि यह साबित हो जाता है कि लोक सेवक ने किसी सरकारी कार्य के एवज में रिश्वत की मांग की थी, तो उस लोक सेवक को सिद्ध दोष किया जा सकता है।
ट्रैप बिछाना सबूत एकत्र करने का मात्र एक साधन है जिससे कि अपराध साबित किया जा कके। इसे इस लिए तरजीह दी जाती है कि यह अच्छे सबूत एकत्र करने को बढ़ावा देता है और मामले को पक्का करता है। ट्रैप की अनुपस्थिति में रिश्वत की मांग के सबूत को एकत्र करना मुश्किल हो जाता है। इसका मतलब यह नहीं होता कि ट्रैप बिछाना अनिवार्य है और ट्रैप की अनुपस्थिति में कुछ भी नहीं किया जा सकता है।


19. हम अक्सर यह सुनते हैं कि रिश्वत लेना ही नहीं बल्कि रिश्वत देना भी कानूनन अपराध है। इस मामले में ट्रैप बिछाने हेतु शिकायतकर्त्ता जो आरोपी व्यक्ति को रिश्वत देता है, क्या वह भी एक अपराधी नहीं है ?

भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम, 1988 की धारा 12 के अनुसार रिश्वत देना भी निश्चित रूप से एक अपराध है, परंतु सिर्फ तब जब उसे स्वेच्छा से दिया जाए। कानून यद्यपि वैसे व्यक्तियों को बचाती है जो किसी लोक सेवक द्वारा रिश्वत की मांग को स्वीकार कर लिया हो। भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम, 1988 की धारा 24 ट्रैप बिछाने की प्रक्रिया के दौरान शिकायकर्ता को वैसी बचाव एवं कृत्यों का प्रावधान करती है। अत: वैसे मामलों में शिकायतकर्ता के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती है।


20. एक ईमानदार लोक सेवक को क्या करना चाहिए जब कोई व्यक्ति उसे रिश्वत देने का प्रस्ताव करता है ?

जैसा कि प्रश्न संख्या 19 के उत्तर में दर्शाया गया है, रिश्वत का प्रस्ताव करना या स्वेच्छा से देना भी भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम, 1988 की धारा 12 के अंतर्गत दंडनीय अपराध है। ऐसे मामलों में एक ईमानदार व्यक्ति को किसी अन्य व्यक्ति से ऐसे प्रस्ताव मिलने पर सीबीआई को शीघ्र सूचित करना चाहिए। वस्तुत: एक ईमानदार लोक सेवक को चाहिए कि वो वैसे व्यक्तियों को नजरअंदाज या सिर्फ फटकारें नहीं बल्कि उन्हें दंडित करने हेतु कदम उठाएं। इससे संदिग्ध व्यक्तियों में रिश्वत देने के प्रति डर बैठेगा।


21. यह अक्सर सुना जाता है कि उच्च पदों पर आसीन लोक सेवक सीधे तौर पर रिश्वत की न तो मांग करते हैं और न ही लेते हैं बल्कि वे किसी दलाल या बिचौलिए के माध्यम से लेते हैं। क्या सीबीआई ऐसे दलालों और बिचौलियों के विरुद्ध भी कार्रवाई करती है ?

अवश्य। भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम, 1988 की धारा 8 एवं 9 में वैसे दलालों/बिचौलियों को दंडित करने का प्रावधान है। वैसे दलालों/बिचौलियों के विरुद्ध सूचना/शिकायत मिलने पर सीबीआई उनके विरुद्ध शिकायतकर्ता या अन्य दूसरे तरीके से ट्रैप बिछाती है। इसके साथ ही सीबीआई संबंधित लोक सेवक के विरुद्ध भी सबूत इकट्ठा करने का प्रयास करती है जिसकी ओर से ये दलाल/बिचौलिए सक्रिय रहते हैं। वैसे लोक सेवक भी भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम, 1988 की धारा 10 के अंतर्गत दंडित किए जा सकते हैं। सीबीआई आम जनता से यह निवेदन करती है कि केंद्रीय सरकार के लोक कार्यालयों में सक्रिया वैसे जाने पहचाने दलालों/बिचौलियों के संबंध में सूचना उपलब्ध कराएं। सीबीआई अपने स्तर पर वैसी सूचनाओं के सत्यापन हेतु कदम उठाती है और वैसे दलालों/बिचौलियों के विरुद्ध बिना शिकायतकर्ता के भी कार्यवाही सुनिश्चित करती है।


22. क्या ऐसे भी मामले हैं जब सीबीआई ने रिश्वत देने के इच्छुक व्यक्ति और रिश्वत लेने वाले के विरुद्ध एक साथ कार्यवाही की है ?

हां, ऐसे मामले भी हैं। यदि सीबीआई को किसी प्रमाणिक सूचनाकर्ता से किसी इच्छुक रिश्वत देने वाले या रिश्वत लेने वाले के संबंध में रिश्वत सौंपे जाने से पहले ही सूचना प्राप्त होती है तो वह वैसी सूचना का सत्यापन कर रिश्वत देने वाले और रिश्वत लेने वाले दोनों को रंगे हाथों पकड़ने हेतु ट्रैप बिछाती है।


23. हम अक्सर अपने बीच भ्रष्ट लोक सेवकों को एक विलासितापूर्ण जीवनशैली जीते हुए और आय से अधिक संपत्ति रखते हुए देखते हैं। क्या सीबीआई ऐसे लोक सेवकों के विरुद्ध कार्यवाही कर सकती है ?

अवश्य। किसी लोक सेवक द्वारा आमदनी के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति रखना या खर्च करना भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम, 1988 की धारा 13 के तहत दंडनीय है। सीबीआई जनता से वैसे लोक सेवकों की संपत्तियों एवं खर्चे का विशिष्ट विवरण उपलब्ध कराने हेतु निवेदन करती है। सामान्य एवं अस्पष्ट सूचना उपलब्ध कराने से कोी मदद नहीं मिलती है। वैसी विशिष्ट विवरण प्राप्त होने पर सीबीआई उसकी गोपनीय सत्यापन करता है और यदि सूचना सत्य पाई जाती है तो आपराधिक मामला दर्ज कर वैसे लोक सेवकों के परिसर पर छापा मारता है।


24. क्या सीबीआई सूचनादाता की पहचान गुप्त रखती है ?

कृपया ऊपर दिए गे प्रश्न संख्या 14 का उत्तर देखें।


25. क्या सीबीआई सूचनादाता को नकद पुरस्कार देती है ?

नहीं। सीबीआई में ऐसी कोई नीति नहीं है। किसी अपराध के संबंध में सूचना प्रदान करने पर किसी व्यक्ति को नकद पुरस्कार प्रदान नहीं किया जाता है, जैसा कि ऊपर दिए गए प्रश्न संख्या 5 के उत्तर में उल्लिखित है।


26. क्या सीबीआई में आंतरिक सतर्कता स्थापित है ?

हां। सीबीआई में अपने कर्मियों के आचरण पर पैनी निगाह रखने हेतु एक अत्यंत मजबूत आंतरिक सतर्कता व्यवस्था है। सीबीआई में अपने कर्मियों की सत्यनिष्ठा के मामले में शून्य सहनशीलता है। इस बात की सत्यता इससे जाहिर होती है कि सीबीआई अपने ही कर्मियों के विरुद्ध आपराधिक मामला पंजीकृत करने से बिल्कुल नहीं हिचकिचाती है, जब वैसे कर्मियों के द्वारा भ्रष्टाचार किया जाता है।


27. सीबीआई द्वारा अभियोजित आपराधिक मामलों में दोषसिद्धि दर क्या है ?

दोषसिद्धि दर 65 से 70% तक ऊंची है ेवं इसे विश्व की सर्वोत्तम अन्वेषण एजेंसियों से तुलना किया जा सकता है।


28. मामलों के अन्वेषण में सीबीआई इतना समय क्यों लेती है ?

अन्वेषणों के संचालन में सीबीआई अधिकतम पेशेवराना आचरण अपनाती है। अन्वेषणों के दौरान विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के उपयोग पर अत्यधिक जोर दिया जाता है। फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं एवं अन्य विशेषज्ञों जैसे (जीईक्यूडी) के द्वारा सबूतों के मूल्यांकन की आवश्यकता होती है। इसमें अक्सर समय लगता है। सीबीआई के कई मामलों में विदेशों में अन्वेषण की आवश्यकता होती है। विदेश में सबूत इक्ट्ठे करना कई बाह्य कारकों पर निर्भर करती है जिस पर सीबीआई का कोई नियंत्रण नहीं होता है। संबंधित देश को अनुमति हेतु पत्र जारी किए जाते हैं एवं उस देश के विधि प्रवर्तन एजेंसियों से सबूत इक्ट्ठा करने का आग्रह किया जाता है। इससे विलम्ब होता है।

इसके अलावा सीबीआई में बहु-परतीय पर्यवेक्षण है। इक्ट्ठे किए गए सबूतों का गहन विश्लेषण कार्यपालक अधिकारियों एवं विधि अधिकारियों द्वारा विभिन्न स्तरों पर किया जाता है। इन सभी कारकों के चलते सीबीआई अन्वेषणों में अक्सर समय लग जाता है। यह कहते हुए यहां यह बताना महत्वपूर्ण है कि ट्रैप मामलों में अन्वेषण सामान्यत: एक महीने से लेकर 3 महीने की अवधि तक में समाप्त हो जाती है। हाल में सीबीआई में अन्वेषणों को पूरा करने पर अत्यंत जोर दिया जा रहा है। यह निर्णय लिया गया है कि एक वर्ष की अवधि के अन्दर ही अन्वेषण को पूरा कर लिया जाए।


29. क्या सीबीआई अपराध अन्वेषण के अलावा भी कोई अन्य महत्वपूर्ण कार्य करती है ?

हां। सीबीआई को भारत का इंटरपोल अधिसूचित किया गया है। सीबीआई की गाजियाबाद में एक प्रशिक्षण अकादमी है जहां पर यह विभिन्न विषयों पर न सिर्फ अपने अधिकारियों के लिए बल्कि अन्य देशों के अधिकारियों सहित राज्य एवं केंद्र शासित पुलिस संगठनों के अधिकारियों, सार्वजनिक उपक्रमों, बैंकों इत्यादि के सतर्कता अधिकारियों के लिए भी प्रशिक्षण का आयोजन किया जाता है।


30. भारत की इंटरपोल के रूप में सीबीआई की क्या भूमिका है ?

वैश्वीकरण एवं सूचना प्रौद्योगिकी की इस युग में अपराध एवं अपराधी आसानी से राष्ट्रीय सीमाएं पार कर जाते हैं। अपराध एवं अपराधी ट्रांसनैशनल बन गए हैं। विभिन्न देशों की विधि प्रवर्तन एजेंसियों के बीच सहयोग को बढ़ावा देने हेतु अंतरराष्ट्रीय पुलिस अपराधी संस्थान (आईसीपीओ या इंटरपोल) एक महत्वपूर्ण संस्था बन कर उभरी है।

भारत की इंटरपोल के रूप में सीबीआई भारत और अन्य देशों की विधि प्रवर्तन एजेंसियों के बीच वैसी सहयोग को सुनिश्चित करने हेतु एक अन्तरापृष्ठ (interface) बन कर उभरी है। यह इन एजेंसियों के द्वारा सूचनाओं का आदान-प्रदान एवं साझेदारी को सरलीकृत करता है। यह भारत में वॉन्टेड भगौड़ अपराधियों की रेड नोटिस भी प्रकाशित करवाता है।

उपर्युक्त के अलावा यह भारत एवं अन्य देशों के बीच आपसी कानूनी सहयोग संधियों (एमएलएटी) एवं प्रत्यार्पण संधियों के समझौता वार्ता तथा उसे अंतिम रूप देने में अपनी भूमिका निभाता है। सीबीआई भारत एवं भारत के बाहर अन्वेषण हेतु अनुमति पत्रों के निष्पादन को सरलीकृत करता है।


31. रेड नोटिस क्या है ?

यह सदस्य देशों के सभी विधि प्रवर्तन एजेंसियों के द्वारा किसी आपराधिक मामले में किसी भगौड़े का पता लगाने हेतु किसी सदस्य देश के आग्रह पर फ्रॉंस में स्थित इंटरपोल मुख्यालय के द्वारा प्रकाशित किया गया नोटिस होता है। अगर वैसे भगौड़े का पता चल जाता है तो निवेदन करने वाले देश को यह सूचना दी जाती है ताकि वह भगौड़े के प्रत्यावर्तन हेतु कार्यवाही सुनिश्चित कर सके।


32. किसी भगौड़े के प्रत्यार्पण में सीबीआई इंटरपोल की क्या भूमिका होती है ?

ऐसे मामलों में सीबीआई की भूमिका अत्यंत सीमित होती है। विदेशी मामलों के मंत्रालय (एमईए) भगौड़ों के प्रत्यावर्तन हेतु नोडल एजेंसी है। सीबीआई इंटरपोल भगौड़ों को ढ़ूंढने/पता लगाने में विधि प्रवर्तन एजेंसियों की मदद करता है ताकि वह भगौड़े के प्रत्यार्पण के लिए एमईए से औपचारिक निवेदन कर सके।


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